नई दिल्ली: दिल्ली के Press Club of India परिसर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कटआउट के सामने आरती और ‘मोदी चालीसा’ का पाठ किए जाने का वीडियो सामने आने के बाद एक नई बहस छिड़ गई है। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान राम जैसी वेशभूषा में दिखाया गया। सामने आरती की गई और “जय-जय मोदी, हर-हर मोदी” के नारे भी लगाए गए। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या किसी मौजूदा राजनीतिक नेता को धार्मिक प्रतीकों और पूजा-पाठ से जोड़ना भारतीय संस्कृति और आस्था के साथ उचित व्यवहार है।
Press Club of India में मोदी चालीसा से क्यों मचा बवाल?
Press Club of India में मोदी चालीसा का यह कार्यक्रम 20 अगस्त को हुआ। सामने आए वीडियो में एक बड़े कटआउट में पीएम मोदी को मुकुट और धनुष-बाण के साथ भगवान राम के रूप में दिखाया गया। इसके सामने आरती की गई और ‘मोदी चालीसा’ का पाठ किया गया। कार्यक्रम में शामिल लोगों को मोदी के समर्थन में नारे लगाते हुए भी देखा गया।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कार्यक्रम से जुड़े लोगों में बिहार राज्य किन्नर कल्याण बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. राजन सिंह का नाम सामने आया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मान में बिहार में मंदिर बनाने की योजना का भी समर्थन किया है। PTI के हवाले से आई रिपोर्टों के मुताबिक, मंदिर की प्रस्तावित लागत करीब 112 करोड़ रुपये बताई गई है।
क्या यह भारतीय संस्कृति और आस्था का अपमान है?
यह सवाल अब इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है। एक तरफ समर्थक इसे प्रधानमंत्री के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की अभिव्यक्ति बता रहे हैं। दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि हिंदू धार्मिक परंपराओं में इस्तेमाल होने वाले चालीसा, आरती और भगवान राम के प्रतीकों को किसी जीवित राजनीतिक नेता के लिए इस्तेमाल करना धार्मिक आस्था को राजनीति से जोड़ने जैसा है।
हालांकि, इसे सीधे तौर पर “भारतीय संस्कृति का अपमान” कहना एक मूल्य-आधारित निष्कर्ष होगा, कोई स्थापित तथ्य नहीं। इस पर लोगों की राय अलग हो सकती है। खबर का तथ्य इतना स्पष्ट है कि धार्मिक प्रतीकों और पूजा की शैली का इस्तेमाल प्रधानमंत्री के सम्मान में किया गया, जिसके बाद धार्मिक आस्था, राजनीतिक व्यक्तित्व और सार्वजनिक संस्थानों की मर्यादा को लेकर सवाल उठे हैं।
Press Club ने क्या कहा?
विवाद बढ़ने के बाद Press Club of India ने स्पष्ट किया कि इस कार्यक्रम का आयोजन क्लब ने नहीं किया था। क्लब के मुताबिक, एक संगठन ने परिसर का हॉल प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए किराए पर लिया था, लेकिन बाद में किराए की शर्तों का उल्लंघन करते हुए वहां यह कार्यक्रम किया गया। क्लब ने कहा कि जानकारी मिलने के बाद अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया और कार्यक्रम को रोक दिया।
यानी वायरल वीडियो देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि Press Club of India ने आधिकारिक रूप से मोदी की पूजा या ‘मोदी चालीसा’ कार्यक्रम आयोजित किया था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक क्लब ने आयोजन से खुद को अलग कर लिया है और कहा है कि उसने कार्यक्रम को रोक दिया था।
मामला सिर्फ मोदी तक सीमित नहीं
इस घटना ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है। भारत में राजनीतिक नेताओं के प्रति सम्मान और धार्मिक आस्था के बीच सीमा कहां तय होनी चाहिए? किसी नेता के काम की प्रशंसा करना राजनीतिक लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है, लेकिन जब किसी निर्वाचित नेता को भगवान के रूप में दिखाकर धार्मिक अनुष्ठान किए जाएं, तो स्वाभाविक रूप से उस पर बहस होना तय है।
Press Club of India में मोदी चालीसा का मामला इसलिए भी ज्यादा चर्चा में है क्योंकि घटना किसी सामान्य राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि देश के प्रमुख पत्रकार संगठनों में शामिल Press Club के परिसर में हुई। हालांकि क्लब ने साफ कर दिया है कि वह इस आयोजन का आयोजक नहीं था और नियमों के उल्लंघन के बाद कार्यक्रम रोक दिया गया।
फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इसे “आस्था बनाम राजनीतिक व्यक्तित्व पूजा” की बहस के रूप में देखा जा सकता है। यह कहना कि इससे निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति या हिंदू आस्था का अपमान हुआ है, एक राय होगी। वहीं यह सवाल जरूर गंभीर है कि धार्मिक परंपराओं और प्रतीकों का इस्तेमाल किसी जीवित राजनीतिक नेता के लिए किस सीमा तक उचित माना जाना चाहिए।













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