करीब 25 साल से चले आ रहे सोन नदी जल बंटवारा विवाद को लेकर बिहार और झारखंड के बीच अब सहमति बन गई है। समझौते के मुताबिक सोन नदी के कुल 7.75 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी में बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF पानी मिलेगा।
दोनों राज्यों के बीच पानी की हिस्सेदारी तय होने के बाद लंबे समय से चल रहा यह विवाद अब खत्म होने की उम्मीद है।
25 साल से क्यों अटका था मामला?
साल 2000 में झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर बिहार और झारखंड के बीच मतभेद शुरू हुए थे।
अविभाजित बिहार को पहले से सोन नदी के पानी में 7.75 MAF हिस्सा मिला हुआ था। झारखंड के गठन के बाद राज्य ने भी सोन नदी के पानी में अपनी हिस्सेदारी की मांग की। इसके बाद करीब ढाई दशक तक दोनों राज्यों के बीच इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी।
अब बिहार-झारखंड सोन नदी जल बंटवारा को लेकर हुए नए समझौते से इस पुराने विवाद के सुलझने का रास्ता साफ होता दिख रहा है।
किसानों को मिल सकता है फायदा
इस समझौते का सबसे बड़ा असर सिंचाई व्यवस्था पर पड़ सकता है। सोन नदी के पानी का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में खेती और सिंचाई के लिए होता है।
बिहार के भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना जैसे इलाकों में सिंचाई और पानी की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है।
वहीं झारखंड के पलामू, गढ़वा और आसपास के इलाकों में भी सोन नदी का पानी मिलने से खेती और ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है।
इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को मिल सकती है रफ्तार
बिहार-झारखंड सोन नदी जल बंटवारा विवाद का असर इंद्रपुरी जलाशय परियोजना पर भी पड़ा था। पानी की हिस्सेदारी को लेकर सहमति नहीं बनने के कारण परियोजना को आगे बढ़ाने में दिक्कतें आ रही थीं।
अब दोनों राज्यों के बीच समझौता होने के बाद इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है। इससे सिंचाई और जल प्रबंधन को बेहतर बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
पेयजल के लिए भी अहम
सोन नदी का पानी सिर्फ खेती के लिए ही नहीं, बल्कि पेयजल जरूरतों के लिए भी महत्वपूर्ण है। समझौते के बाद पानी की उपलब्धता बेहतर होने पर ग्रामीण इलाकों में लोगों को फायदा मिल सकता है। खासकर गर्मी के मौसम में पानी की कमी वाले क्षेत्रों के लिए यह समझौता काफी अहम माना जा रहा है।












